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दुष्कर्म के घटनाओंं पर

 हा ! हा ! चित्त  को  बेधता   है, बेधता   है  मर्म  को। धिक्कार है सौ बार  उस  दुष्कर्म  को, उस  धर्म  को। सिखला रहे जो खींचना युवती सती के  लाज  को। धिक्कार है उस मनुज को भी और सभ्य-समाज को। है पनपते ये कीट नित- नित  ढीठ  होते  जा  रहे। वे सभ्यता के अहितकर हैं, सभ्यता को खा  रहे। बन घूमता है भेड़ियाँ अब भेड़  के  ही  स्वांग में। हो सावधान सभी! नहीं तो नोच खाय छलाँग में। श्रृंगाल ज्यों मृत  जीव  खाता है बड़े  ही  चाव  से। छि:! आज मानव नोंचते है मनुज को उस भाव से। दुष्कर्म  की  यह बात  ऐसे  तीव्र  होती  जा   रही। अब  प्रेम  से  भी  देखने  में  आप  लज्जा  आ  रही। कुछ मनुज ने ही है किया नत मस्तकें निज जाति की । लूटा  दिया  सत्कर्म, मानव- धर्म, थाती  जाति  की। ओ   जागिये   धर्मेश  सारे  राज   कैसे  हो...

गाँव की साँझ

  ■कविता■ एक साँझ गाँव में लेटा हुआ   पीठ के  बल  खाट पर, अनिमिष ही लगा निहारने  मैं क्षितिज पुतली में भरकर। तिरोभूत  हो  गए  रवि, थे   शशांक  हो रहे भासमान पश्चिम में  बिखरे  गेरू -सा   दीखने  लगा  आसमान। लौट रहे  सब  श्रांत  प्राणधर   अपने  रैन  बसेरे  में, चहक उठे  पंछी  गण  अपने   नीड़, कोटरे, डेरे  में। लगी ज्योत्स्ना छाने औ'  रूपहले रूप तारक दिखाने, खे-खेकर पालों की  नौका   पार  पवन  लगे  लगाने। विद्युत की प्रभूत प्रभास में  छिटपुट जुगनू तेजहीन, थे झीं-झीं करते चहुओर  गिटार लिए झींगुर-प्रवीण। कीट-पतंगे  नाच- नाचकर  ना  जाने  क्या पाते थे, उलूक तथा चमगादड़  गगन में करतब दिखलाते थे। शरभ प्राण के दाँव लगा   बल्बों के घूर्णन करते थे, भीतों पर छिपकली छिप- छिपकर आखेटन करते थे। ©ऋतुपर्ण