अपील(कहानी)
कहानी -------- शाम का प्रहर था।अभी सूरज का अस्ताचल गमन हुआ ही था,उसके उपरांत भी उसकी लोहित आभा अभी गाँव की धरती पर सुर्ख-झीना चादर ओढ़ाए थी। तभी यकायक गाय रंभाने लगी।हवेली में कृष्णाष्टमी की पूजा का धूम मचा था।अतएव व्यस्त होने के कारण गोपालक,माघव चौधरी, ने तत्काल कारण जानना उचित नहीं जाना और अनसुना कर कार्यरत रहे। सुलेखा देवी कुर्सी पर बैठी-बैठी पुत्र को संबोधन करती बोलीं-"अरे माघव,जरा देख आ इस गैया को क्या हुआ?" बिजली के बोर्ड से पिन जोड़ते हुए माघव बोला-"रहने भी दो...हमें कन्हैया की पड़ी है और तुम गैया गैया गैया..." "पशु का अकारण इस प्रकार विलखना ठीक नहीं जान पड़ता।" उसकी तरफ मुँह कर कड़कर-"इतनी ही चिंता है तो बथान देख क्यों नहीं आती!" "मैं जोड़ो के दर्द से मरी जा रही हूँ।घूमना-टहलना तो दूर बस चल फिर लेती हूँ...ईश्वर की कृपा है।"- घुटने पकड़कर दीन भाव से बोली। बिजली का बल्ब लगाते हुए- "ये कौन सी नई बात है!परिवार भर में कौन है जो इसका मारा न हो...बाबूजी,बिट्टू,मैं,उसकी माँ सब तो वैसे ही हैं।" "सब भाग्य का दोष है और पूर्वजन्म ...